पैर बने कलम, सपनों से भरी आंखें… फिर भी नौकरी से दूर क्यों बाड़मेर की लीला कंवर?

बाड़मेर की लीला कंवर ने बचपन में दोनों हाथ खोने के बावजूद हार नहीं मानी और पैरों से लिखकर 10वीं, 12वीं और बीए तक की पढ़ाई पूरी की तथा कंप्यूटर चलाना भी सीखा। शिक्षक बनने के लिए एसटीसी में चयन होने के बाद संस्थान ने नियमों का हवाला देकर प्रवेश देने से मना कर दिया। इसके बाद सरकारी नौकरियों के लिए किए गए कई प्रयास भी असफल रहे। लीला का संघर्ष दिव्यांगजनों के लिए बनी नीतियों और अवसरों की समानता पर सवाल खड़ा करता है, जहां वह सहानुभूति नहीं बल्कि बराबरी का अवसर मांग रही हैं।

Basanti Parmar
Basanti Parmar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor
February 23, 2026 • 4:42 PM  949
राजस्थान
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पैर बने कलम, सपनों से भरी आंखें… फिर भी नौकरी से दूर क्यों बाड़मेर की लीला कंवर?
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23 Feb 2026
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पैर बने कलम, सपनों से भरी आंखें… फिर भी नौकरी से दूर क्यों बाड़मेर की लीला कंवर?

बाड़मेर। राजस्थान के बाड़मेर जिले की रहने वाली लीला कंवर की कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और व्यवस्था की चुनौतियों का ऐसा उदाहरण है, जो समाज और सरकारी नीतियों दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। बचपन में हुए एक हादसे में दोनों हाथ गंवाने के बावजूद लीला ने हार नहीं मानी और पैरों को ही अपनी ताकत बनाकर शिक्षा की हर सीढ़ी पार की।

हादसे ने हाथ छीने, हौसला नहीं

कम उम्र में हुए दुर्घटना ने लीला कंवर के दोनों हाथ छीन लिए, लेकिन पढ़ने-लिखने का सपना नहीं। उन्होंने पैरों से लिखना सीखा और धीरे-धीरे वही उनके लिए कलम बन गए। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने 10वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की, फिर स्नातक (बीए) की डिग्री हासिल की। इतना ही नहीं, उन्होंने कंप्यूटर चलाना भी सीखा और पैरों से ही कीबोर्ड इस्तेमाल करना शुरू किया।

Basanti Parmar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor

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