एक हाथ खोया, लेकिन हौसला नहीं… जयपुर के दीपेंद्र ने एवरेस्ट बेस कैंप पर फहराया तिरंगा

सात साल की उम्र में एक हादसे ने दीपेंद्र सिंह हाड़ा की जिंदगी बदल दी थी। दाहिना हाथ खोने के बाद लोग उन्हें कमजोर समझने लगे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अब जयपुर के इस युवा ने दुनिया के सबसे कठिन ट्रेक में शामिल एवरेस्ट बेस कैंप पर पहुंचकर ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिसकी हर तरफ चर्चा हो रही है।

Kashish Sain
Kashish Sain Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor
May 10, 2026 • 3:15 PM  30
राजस्थान
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एक हाथ खोया, लेकिन हौसला नहीं… जयपुर के दीपेंद्र ने एवरेस्ट बेस कैंप पर फहराया तिरंगा
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10 May 2026
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एक हाथ खोया, लेकिन हौसला नहीं… जयपुर के दीपेंद्र ने एवरेस्ट बेस कैंप पर फहराया तिरंगा

गुलाबी नगरी जयपुर के रहने वाले दीपेंद्र सिंह हाड़ा आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। सात साल की छोटी उम्र में एक दर्दनाक हादसे में अपना दाहिना हाथ गंवाने वाले दीपेंद्र ने जिंदगी से हार मानने के बजाय संघर्ष को अपनी ताकत बना लिया। अब उन्होंने हिमालय की कठिन वादियों में स्थित दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण ट्रेक्स में शामिल एवरेस्ट बेस कैंप (EBC) तक पहुंचकर तिरंगा फहराया है। उनकी यह उपलब्धि सिर्फ एक ट्रेक पूरा करने की कहानी नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास और मजबूत इरादों की मिसाल है।

सात साल की उम्र में बदल गई जिंदगी

दीपेंद्र की जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा 14 दिसंबर 2008 को हुआ। उस दिन स्कूल की छुट्टी थी और वे दोस्तों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते बच्चे एक निर्माणाधीन मकान की छत पर पहुंच गए। किसी को अंदाजा नहीं था कि वहां से 33 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन गुजर रही है। अचानक दीपेंद्र का दाहिना हाथ बिजली के तार से छू गया। जोरदार धमाके के साथ वे बुरी तरह झुलस गए। कई महीनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष चलता रहा। आखिरकार डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए दाहिना हाथ काटना पड़ा। एक छोटे बच्चे के लिए यह सदमा जिंदगी तोड़ देने वाला था, लेकिन दीपेंद्र ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

समाज के तानों को बनाया ताकत

हादसे के बाद शुरुआती साल दीपेंद्र के लिए बेहद कठिन रहे। लोग उन्हें अलग नजरों से देखते थे। कई बार अफसोस जताते, तो कुछ लोग उन्हें परिवार पर बोझ तक कह देते थे। दीपेंद्र बताते हैं कि शुरुआत में वे खुद भी टूट चुके थे। गुस्सा आता था, लोगों से बात नहीं करते थे और खुद में खोए रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को संभाला और तय कर लिया कि वे अपनी पहचान खुद बनाएंगे। उन्होंने ठान लिया कि वे परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि गर्व बनने का काम करेंगे।

Kashish Sain Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor

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