एक हाथ खोया, लेकिन हौसला नहीं… जयपुर के दीपेंद्र ने एवरेस्ट बेस कैंप पर फहराया तिरंगा
सात साल की उम्र में एक हादसे ने दीपेंद्र सिंह हाड़ा की जिंदगी बदल दी थी। दाहिना हाथ खोने के बाद लोग उन्हें कमजोर समझने लगे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अब जयपुर के इस युवा ने दुनिया के सबसे कठिन ट्रेक में शामिल एवरेस्ट बेस कैंप पर पहुंचकर ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिसकी हर तरफ चर्चा हो रही है।
गुलाबी नगरी जयपुर के रहने वाले दीपेंद्र सिंह हाड़ा आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। सात साल की छोटी उम्र में एक दर्दनाक हादसे में अपना दाहिना हाथ गंवाने वाले दीपेंद्र ने जिंदगी से हार मानने के बजाय संघर्ष को अपनी ताकत बना लिया। अब उन्होंने हिमालय की कठिन वादियों में स्थित दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण ट्रेक्स में शामिल एवरेस्ट बेस कैंप (EBC) तक पहुंचकर तिरंगा फहराया है। उनकी यह उपलब्धि सिर्फ एक ट्रेक पूरा करने की कहानी नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास और मजबूत इरादों की मिसाल है।
सात साल की उम्र में बदल गई जिंदगी
दीपेंद्र की जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा 14 दिसंबर 2008 को हुआ। उस दिन स्कूल की छुट्टी थी और वे दोस्तों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते बच्चे एक निर्माणाधीन मकान की छत पर पहुंच गए। किसी को अंदाजा नहीं था कि वहां से 33 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन गुजर रही है। अचानक दीपेंद्र का दाहिना हाथ बिजली के तार से छू गया। जोरदार धमाके के साथ वे बुरी तरह झुलस गए। कई महीनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष चलता रहा। आखिरकार डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए दाहिना हाथ काटना पड़ा। एक छोटे बच्चे के लिए यह सदमा जिंदगी तोड़ देने वाला था, लेकिन दीपेंद्र ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
समाज के तानों को बनाया ताकत
हादसे के बाद शुरुआती साल दीपेंद्र के लिए बेहद कठिन रहे। लोग उन्हें अलग नजरों से देखते थे। कई बार अफसोस जताते, तो कुछ लोग उन्हें परिवार पर बोझ तक कह देते थे। दीपेंद्र बताते हैं कि शुरुआत में वे खुद भी टूट चुके थे। गुस्सा आता था, लोगों से बात नहीं करते थे और खुद में खोए रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को संभाला और तय कर लिया कि वे अपनी पहचान खुद बनाएंगे। उन्होंने ठान लिया कि वे परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि गर्व बनने का काम करेंगे।
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पढ़ाई और तकनीक में दिखाई प्रतिभा
दीपेंद्र बचपन से पढ़ाई में अच्छे रहे। उन्हें कंप्यूटर और तकनीक में खास रुचि थी। उन्होंने विज्ञान और गणित विषयों के साथ पढ़ाई की और अच्छे अंकों से 10वीं और 12वीं पास की। इसके बाद उन्होंने कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। कॉलेज घर से करीब 7 किलोमीटर दूर था, लेकिन उन्होंने कभी इसे कमजोरी नहीं बनने दिया। वे रोजाना एक हाथ से साइकिल चलाकर कॉलेज जाते थे। हर दिन लगभग 14 किलोमीटर का सफर तय करना उनके लिए सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की यात्रा थी।
एडवेंचर को बनाया जिंदगी का हिस्सा
दीपेंद्र ने खुद को सीमित नहीं होने दिया। उन्होंने पैराग्लाइडिंग, पैरासेलिंग, जेट स्की, साइक्लिंग और बंजी स्विंग जैसी रोमांचक गतिविधियों में हिस्सा लिया। उन्होंने 228 मीटर ऊंचे बंजी स्विंग का अनुभव भी लिया। उनके लिए एडवेंचर सिर्फ रोमांच नहीं, बल्कि खुद को हर दिन नई चुनौती देने का जरिया बन गया।
एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक बना सबसे बड़ा इम्तिहान
एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक दुनिया के सबसे कठिन ट्रेक्स में गिना जाता है। करीब 5,364 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचने वाला यह सफर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की भी परीक्षा होता है। तेज बर्फीली हवाएं, ऑक्सीजन की कमी, कठिन चढ़ाई और बदलता मौसम हर कदम पर चुनौती पेश करते हैं। दीपेंद्र और उनकी टीम को रोजाना 8 से 10 किलोमीटर तक कठिन रास्तों पर ट्रेक करना पड़ा। उन्होंने बताया कि कई बार हालात बेहद मुश्किल हो जाते थे, लेकिन टीम ने हिम्मत नहीं हारी।
समावेशिता का बड़ा संदेश
यह अभियान Tinkesh Ability Foundation द्वारा आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य विभिन्न क्षमताओं वाले लोगों को एडवेंचर गतिविधियों में समान अवसर देना था। दीपेंद्र का कहना है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की असली सीमा नहीं होती, बल्कि असली सीमाएं समाज की सोच में होती हैं। उनके अनुसार यदि समाज समावेशी माहौल बनाए, तो हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सकता है।
युवाओं के लिए प्रेरणा बने दीपेंद्र
आज दीपेंद्र सिंह हाड़ा सिर्फ एक ट्रेकर नहीं, बल्कि संघर्ष और सकारात्मक सोच की जीवंत मिसाल बन चुके हैं। उनकी कहानी बताती है कि जिंदगी में मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इंसान हार मानने से इनकार कर दे तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। उन्होंने साबित कर दिया कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि इंसान के इरादों में होती है।
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Kashish Sain Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor
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