साथ ही अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को स्पष्ट निर्देश दिए कि कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना भोजशाला परिसर में किसी भी प्रकार का संरचनात्मक बदलाव या छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किए। हालांकि अदालत ने फिलहाल अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला अभी प्रभावी रहेगा और पहले की व्यवस्था तत्काल बहाल नहीं होगी।
मुस्लिम पक्ष की याचिका पर सुनवाई
मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें भोजशाला-कमाल मौला परिसर को मां सरस्वती का मंदिर माना गया था तथा परिसर में नमाज अदा करने पर रोक लगा दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है और मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले की विस्तृत सुनवाई लगभग तीन सप्ताह बाद की जा सकती है।
ASI को दिए गए स्पष्ट निर्देश
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने मांग की कि मामले के अंतिम निर्णय तक परिसर की मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने ASI को निर्देश दिया कि कोर्ट की अनुमति के बिना परिसर में किसी भी प्रकार का निर्माण, तोड़फोड़ या संरचनात्मक परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
मुस्लिम पक्ष ने क्या दलील दी?
वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने अदालत में कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से वर्षों से चली आ रही धार्मिक व्यवस्था पूरी तरह बदल गई है। उनके अनुसार लंबे समय से शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज अदा करता था, जबकि मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा की अनुमति थी।
उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुस्लिम समुदाय को परिसर में प्रवेश और नमाज अदा करने से वंचित कर दिया गया है। साथ ही ASI की सर्वे रिपोर्ट और उसके आधार पर निकाले गए निष्कर्षों पर भी सवाल उठाए गए।
पूजा स्थल अधिनियम का हवाला
मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि हाईकोर्ट का फैसला पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की भावना और प्रावधानों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि परिसर में लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है और इसके समर्थन में सरकारी अभिलेख भी मौजूद हैं। ऐसे में दशकों से चली आ रही व्यवस्था को बदलना कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रशासन ने पूरे मामले को शांतिपूर्ण ढंग से संभाला है। उन्होंने कहा कि आदेश लागू होने के बाद क्षेत्र में किसी प्रकार की कानून-व्यवस्था की समस्या सामने नहीं आई और प्रशासन ने सामाजिक सौहार्द बनाए रखा।
भोजशाला संयोजक का बयान
सुनवाई के बाद भोजशाला संयोजक गोपाल शर्मा ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार भोजशाला में नियमित पूजा-अर्चना जारी रहेगी। वहीं सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार परिसर के पास तय खुले स्थान पर मुस्लिम समुदाय नमाज अदा कर सकेगा।
क्या था हाईकोर्ट का फैसला?
गौरतलब है कि 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भोजशाला-कमाल मौला परिसर को मां सरस्वती का मंदिर माना था। अदालत ने ASI की सर्वे रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर परिसर में नमाज अदा करने पर रोक लगाते हुए हिंदू पक्ष को नियमित पूजा-अर्चना का अधिकार दिया था।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी अंतिम सुनवाई
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। सर्वोच्च अदालत आगामी सुनवाई में ASI की रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेज, दोनों पक्षों की दलीलें और कानूनी पहलुओं का विस्तार से परीक्षण करेगी। इस मामले का अंतिम फैसला न केवल भोजशाला विवाद बल्कि धार्मिक स्थलों से जुड़े अन्य मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।