ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि सरकार ने जिन कंपनियों के साथ समझौता (MOU) किया है, उनके डिवाइस की कीमत 30 से 35 हजार रुपये तक है। जबकि बाजार में OEM (Original Equipment Manufacturer) से प्रमाणित कई कंपनियां यही डिवाइस 4 से 5 हजार रुपये में उपलब्ध करा रही हैं।
उनका आरोप है कि एक ट्रांसपोर्टर के पास यदि 40 से 50 ट्रक हैं, तो इतनी बड़ी राशि एक साथ खर्च करना संभव नहीं है। इसके अलावा हर साल इन डिवाइस का महंगा रिन्यूअल भी कराना होगा, जिससे आर्थिक बोझ और बढ़ जाएगा।
परमिट और फिटनेस भी अटकी
ट्रैकिंग डिवाइस नहीं लगने का सीधा असर वाहनों के परमिट रिन्यूअल और फिटनेस सर्टिफिकेट पर पड़ रहा है। परिवहन विभाग ने स्पष्ट किया है कि बिना VLTD डिवाइस के कई वाहनों का फिटनेस प्रमाणपत्र और परमिट नवीनीकरण नहीं किया जाएगा।
जोधपुर गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के अनुसार, अकेले जोधपुर में 1500 से अधिक ट्रक, बस और कॉमर्शियल वाहनों की फिटनेस अटकी हुई है। पूरे राजस्थान में यह संख्या करीब 10 हजार तक पहुंच सकती है।
1 हजार से ज्यादा ट्रांसपोर्टर्स होंगे प्रभावित
जोधपुर में सूर्यनगरी गुड्स ट्रांसपोर्ट ऑनली वेलफेयर सोसायटी और जोधपुर गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन सहित दो प्रमुख संगठन इस आंदोलन में शामिल हैं। शहर में 1,000 से अधिक ट्रांसपोर्टर्स इस फैसले से प्रभावित होंगे।
यदि चक्काजाम हड़ताल शुरू होती है, तो जोधपुर आरटीओ क्षेत्र के लगभग 50 हजार ट्रक ड्राइवरों पर इसका असर पड़ सकता है। एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि पहले से जारी ई-वे बिल वाले वाहनों को गंतव्य तक पहुंचने दिया जाएगा, लेकिन नए माल की लोडिंग नहीं होगी।
सरकार की सूची पर ट्रांसपोर्टर्स की आपत्ति
सूर्यनगरी गुड्स ट्रांसपोर्ट ऑनली वेलफेयर सोसायटी के सचिव वीरेंद्र कुमार त्रेहान ने कहा कि बाजार में 100 से अधिक कंपनियां VLTD डिवाइस बना रही हैं, लेकिन सरकार केवल चुनिंदा कंपनियों से डिवाइस खरीदने का दबाव बना रही है।
उन्होंने कहा कि यदि ट्रांसपोर्टर्स को खुला विकल्प दिया जाए तो उन्हें यही डिवाइस करीब 5 हजार रुपये में मिल सकता है। लेकिन अधिकृत कंपनियों से खरीदने पर इसकी कीमत 30 से 35 हजार रुपये तक पहुंच जाती है।
अन्य राज्यों का दिया उदाहरण
ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में सरकारों ने OEM से जुड़े प्रतिबंधों में राहत दी है। राजस्थान में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू करने की मांग की जा रही है ताकि ट्रांसपोर्टर्स अपनी पसंद की मान्यता प्राप्त कंपनी से कम कीमत पर डिवाइस खरीद सकें।
डीजल और टोल की बढ़ती लागत से बढ़ी परेशानी
ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि पहले से ही डीजल की बढ़ती कीमतें, टोल टैक्स और अन्य परिचालन खर्च उन्हें आर्थिक रूप से प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में महंगे ट्रैकिंग डिवाइस को अनिवार्य करना उनके लिए अतिरिक्त बोझ साबित होगा।
उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर सकारात्मक फैसला नहीं लेती, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जा सकता है।