चाय से शुरू हुआ सफर, देश की बागडोर तक: 75वें जन्मदिन पर जानिए हीराबा के लाल नरेंद्र मोदी की अनकही कहानी

वडनगर में चाय की रेहड़ी से शुरू होकर भारत के प्रधानमंत्री तक का सफर, जो गरीबी, संघर्ष और समर्पण से वैश्विक मंच पर चमका।

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Web Desk Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Sub Editor
September 17, 2025 • 12:25 PM  204
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चाय से शुरू हुआ सफर, देश की बागडोर तक: 75वें जन्मदिन पर जानिए हीराबा के लाल नरेंद्र मोदी की अनकही कहानी
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चाय से शुरू हुआ सफर, देश की बागडोर तक: 75वें जन्मदिन पर जानिए हीराबा के लाल नरेंद्र मोदी की अनकही कहानी

75 साल पहले, गुजरात के छोटे से कस्बे वडनगर में एक साधारण घर में एक बच्चे का जन्म हुआ था। वह घर जहां बारिश की बूंदें छत से टपकतीं, और परिवार की मां बर्तनों से पानी रोकने की जद्दोजहद करती। वह बच्चा आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीवन यात्रा किसी परीकथा से कम नहीं – गरीबी की मिट्टी से निकलकर वैश्विक मंच पर चमकने वाली एक कहानी। आइए, इस जन्मदिन पर उनकी जिंदगी को एक कहानी की तरह बुनते हैं, जहां हर अध्याय संघर्ष, समर्पण और सफलता की नई इबारत लिखता है।

गरीबी की गोद में पला बचपन: वडनगर की तंग गलियां और चाय की महक

कल्पना कीजिए, 1950 का गुजरात। वडनगर का काला वासुदेव चौक, जहां खपरैल की छत वाला एक छोटा-सा घर खड़ा था। यहां दामोदरदास और हीराबा का परिवार बसता था – पांच बेटे, एक बेटी और कुल आठ सदस्य एक ही कमरे में। दामोदरदास रेलवे स्टेशन पर चाय की रेहड़ी चलाते, जबकि हीराबा पड़ोस के घरों में बर्तन मांजकर परिवार का पेट पालतीं। 17 सितंबर को जन्मे नरेंद्र, परिवार के तीसरे बेटे, बचपन से ही मेहनत की मिसाल बने। सुबह उठकर पिता की दुकान पर चाय परोसना, यात्रियों से बातें करना – ये सब उनके जीवन का पहला सबक थे।

बारिश के मौसम में छत टपकती, तो छोटा नरेंद्र अपनी मां की मदद के लिए दौड़ पड़ता। किताबों और थिएटर का शौक उसे अलग बनाता। स्कूल में औसत छात्र, लेकिन बहस और नाटकों में चमकदार। कुमारशाला-1 में पढ़ाई के दौरान ही, महज आठ साल की उम्र में, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में जाने लगा। 1958 की दीवाली पर 'वकील साहब' यानी लक्ष्मणराव इनामदार ने बाल स्वयंसेवकों को शपथ दिलाई, और नरेंद्र के मन में राष्ट्रवाद के बीज बो दिए गए। घर की चारदीवारी से बाहर निकलने की चाहत ने उसे 'अनिकेत' नाम दिया – जिसका कोई घर नहीं।

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