बाबा महाकाल का विश्राम धाम ओंकारेश्वर: त्रिकाल पूजा और सावन की भव्य रस्में
ओंकारेश्वर, मध्य प्रदेश में चतुर्थ ज्योतिर्लिंग, मांधाता राजा की तपस्या से प्रकट हुआ, जहां 'ॐ' आकार का पर्वत, नर्मदा नदी, शयन आरती और श्रावण मास की शाही सवारी भक्तों को आकर्षित करती है। ऑनलाइन बुकिंग और व्हीलचेयर जैसी सुविधाओं के साथ यह आध्यात्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र है।
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित ओंकारेश्वर, भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से चतुर्थ ज्योतिर्लिंग के रूप में विख्यात है। यह पवित्र तीर्थ नगरी न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का भी अनूठा संगम है। मान्यता है कि प्रभु श्री राम से 14 पीढ़ी पूर्व मांधाता राजा की कठिन तपस्या से भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। यह ज्योतिर्लिंग मंदिर प्राचीन काल से ही भक्तों के लिए आस्था का केंद्र रहा है, जहां एक अखंड दीपक में तीन बातियां जलती हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित हैं।
ओमकार की आध्यात्मिक भव्यता
ओंकारेश्वर का पूरा पर्वत ही 'ॐ' के आकार में है, जो इसे और भी खास बनाता है। यह पर्वत स्वयं शिवलिंग की आकृति में है, जिसके चारों ओर मां नर्मदा नदी की पवित्र धारा बहती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बाबा महाकाल दिनभर ब्रह्मांड में विचरण करते हैं और रात्रि में ओंकारेश्वर में विश्राम करते हैं। इसीलिए यहां रात को भगवान के शयन के लिए झूला, पालना, चौपड़ और पासे सजाए जाते हैं। रात्रि विश्राम के बाद सुबह 3 बजे बाबा महाकाल उज्जैन के महाकालेश्वर धाम जाते हैं, जहां भस्म आरती होती है। वहीं, ओंकारेश्वर की शयन आरती अपनी अनूठी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है।
त्रिकाल पूजा और श्रावण मास की विशेषता
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में प्राचीन परंपराओं के अनुसार त्रिकाल पूजा की जाती है। सुबह 5 बजे ब्रह्म मुहूर्त में आरती, दोपहर 1 बजे मध्यकाल आरती और रात 10 बजे शयन आरती होती है। श्रावण मास में मंदिर की रौनक और बढ़ जाती है। इस दौरान हर सोमवार को विशेष भोग और आरती के साथ-साथ शाम 4 बजे भगवान की शाही सवारी निकाली जाती है। कोटितीर्थ घाट पर वैदिक विद्वानों की उपस्थिति में महाअभिषेक होता है, और गुलाल उत्सव के साथ नौका विहार और नगर भ्रमण का आयोजन होता है। इसके अलावा, श्रावण मास के पहले दिन से मां नर्मदा की महाआरती भी शाम 7 बजे शुरू की गई है।