बिजाबा गांव का इतिहास भारत-पाकिस्तान के इतिहास से जुड़ा है। वर्ष 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए कुछ लोगों ने इस गांव को बसाया था। वर्तमान में यहाँ करीब 55 परिवार निवास करते हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि आजादी के दशकों बीत जाने और कई सरकारी योजनाएं चलने के बावजूद, इस गांव तक विकास की एक किरण भी नहीं पहुंच पाई है।
प्रमुख समस्याएं: जिन पर नहीं गया प्रशासन का ध्यान
महज 4 किमी दूर बिजली, पर गांव में अंधेरा: गांव के लोगों ने आज तक बिजली का बल्ब जलते नहीं देखा। हैरान करने वाली बात यह है कि मुख्य बिजली लाइन इस गांव से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन फिर भी पोल आज तक गांव तक नहीं पहुंच पाए हैं।
50 डिग्री तापमान में कुओं का सहारा: पश्चिमी राजस्थान की भीषण गर्मी और 50 से 55 डिग्री के टॉर्चर के बीच यहाँ पीने के पानी की भारी किल्लत है। सरकार की 'जल जीवन मिशन' जैसी बड़ी योजना भी यहाँ फेल साबित हुई है। ग्रामीण आज भी अपनी और अपने मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए गहरे कुओं से पानी खींचने को मजबूर हैं।
सड़क, शिक्षा और नेटवर्क का अकाल: गांव में न तो चलने के लिए पक्की सड़कें हैं और न ही बच्चों के पढ़ने के लिए उचित स्कूल। बीमार होने पर इलाज के लिए कोई चिकित्सा केंद्र नहीं है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में गांव में मोबाइल का नेटवर्क तक नहीं पकड़ता, जिससे आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस या मदद बुलाना भी नामुमकिन हो जाता है।
ग्रामीणों की मांग:
"हम भी इसी देश के नागरिक हैं। सरकार और प्रशासन को हमारी सुध लेनी चाहिए। बिजाबा गांव को जल्द से जल्द बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़ा जाए, ताकि हमारे बच्चे भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकें।"
वर्षों से उपेक्षा का दंश झेल रहे बिजाबा गांव के ग्रामीणों ने अब पुरजोर तरीके से सरकार और जिला प्रशासन से अपनी हक की आवाज उठाई है।
अब देखना यह है कि प्रशासन की नींद कब टूटती है और इन विस्थापित परिवारों को कब उनका हक मिलता है।
