भीलवाड़ा में अंधविश्वास का शिकार हुआ 9 महीने का मासूम: निमोनिया के 'इलाज' में गर्म सरिए से दागा, 3 दिन वेंटिलेटर पर संघर्ष के बाद तोड़ा दम

भीलवाड़ा में 9 महीने के बच्चे की अंधविश्वास से मौत; निमोनिया के इलाज में भोपा ने गर्म सरिए से दागा, वेंटिलेटर पर 3 दिन बाद दम तोड़ा,

Mohit Parihar
Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor
November 9, 2025 • 8:46 PM  11
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भीलवाड़ा में अंधविश्वास का शिकार हुआ 9 महीने का मासूम: निमोनिया के 'इलाज' में गर्म सरिए से दागा, 3 दिन वेंटिलेटर पर संघर्ष के बाद तोड़ा दम
“भीलवाड़ा में अंधविश्वास का शिकार हुआ 9 महीने का मासूम: निमोनिया के 'इलाज' में गर्म सरिए से दागा, 3 दिन वेंटिलेटर पर संघर्ष के बाद तोड़ा दम”
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9 Nov 2025
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भीलवाड़ा में अंधविश्वास का शिकार हुआ 9 महीने का मासूम: निमोनिया के 'इलाज' में गर्म सरिए से दागा, 3 दिन वेंटिलेटर पर संघर्ष के बाद तोड़ा दम

 राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में अंधविश्वास की एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया है। निमोनिया से जूझ रहे मात्र 9 महीने के मासूम बच्चे गोविंद की जान चली गई। परिवार ने सर्दी-जुकाम और सांस लेने में तकलीफ के लक्षण दिखने पर डॉक्टर के पास जाने की बजाय स्थानीय भोपा (तांत्रिक) के पास जाकर बच्चे को गर्म लोहे के सरिए से दाग दिया। इस क्रूर 'उपचार' से बच्चे की हालत इतनी बिगड़ गई कि उसे वेंटिलेटर पर रखना पड़ा, लेकिन शनिवार देर रात मासूम ने अंतिम सांस ली। यह घटना सदर थाना क्षेत्र के इरांश गांव की है, जहां अंधविश्वास ने एक नवजात की जिंदगी निगल ली।

घटना की पूरी कथा: अंधविश्वास ने कैसे छीनी मासूम की सांसें घटना के पीछे छिपी कहानी उतनी ही मार्मिक है जितनी दर्दनाक। देव बागरिया के घर 9 महीने पहले गोविंद का जन्म हुआ था। परिवार के अनुसार, कुछ दिनों पहले बच्चे को साधारण सर्दी-जुकाम लगा, जो धीरे-धीरे निमोनिया में बदल गया। सांस लेने में तकलीफ बढ़ने लगी, बुखार चढ़ा और बच्चा रोते-रोते थक जाता। सामान्य समझदारी तो यही कहती कि तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल ले जाया जाए, लेकिन ग्रामीण इलाके में फैले अंधविश्वास ने परिवार को भटका दिया।परिजनों ने बताया कि गांव में ही एक स्थानीय भोपा (झाड़-फूंक करने वाला तांत्रिक) ने दावा किया कि बच्चे पर 'बुरी नजर' या 'भूत-प्रेत' का साया है। भोपा ने सलाह दी कि निमोनिया जैसी 'आत्मिक बीमारी' को दूर करने के लिए लोहे का सरिया आग में गर्म करके बच्चे के छाती, पीठ और पेट पर दागना होगा। यह कुप्रथा राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में प्रचलित है, जहां लोग मानते हैं कि गर्म धातु से दागने से 'दुष्ट शक्तियां' भाग जाती हैं। कोयली देवी ने खुद स्वीकार किया कि भोपा की बातों में आकर उन्होंने यह खतरनाक कदम उठाया। सोमवार को भोपा ने बच्चे के नाजुक शरीर पर कई जगह गर्म सरिए से दाग दिए, जिससे बच्चे के त्वचा पर गंभीर जलन के घाव हो गए। दर्द से तड़पते गोविंद की हालत तुरंत नाजुक हो गई—सांस लेना और मुश्किल, बुखार तेज, और संक्रमण फैल गया।परिजनों को होश आया तो घबराहट में उन्होंने बच्चे को भीलवाड़ा के महात्मा गांधी मातृ एवं शिशु चिकित्सालय पहुंचाया। यहां डॉक्टरों ने निमोनिया के साथ-साथ गंभीर जलन और सेप्सिस (रक्त संक्रमण) का पता लगाया। बच्चे को तुरंत आईसीयू में भर्ती कर वेंटिलेटर पर डाल दिया गया। तीन दिनों तक डॉक्टरों ने जान बचाने की पूरी कोशिश की—एंटीबायोटिक्स, ऑक्सीजन सपोर्ट और दर्द निवारक दवाओं से इलाज चला, लेकिन मासूम का छोटा शरीर इस क्रूरता का बोझ न संभाल सका। शनिवार रात करीब 11 बजे गोविंद ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।

पुलिस कार्रवाई और पोस्टमॉर्टम: अब खुलासा होगा सच का सूचना मिलते ही सदर थाना पुलिस ने अस्पताल पहुंचकर मामले की जांच शुरू कर दी। एसएचओ (स्टेशन हाउस ऑफिसर) ने बताया कि बच्चे के शव का पोस्टमार्टम कराया गया है, जिसमें मौत का सटीक कारण सामने आएगा। प्रारंभिक रिपोर्ट में निमोनिया, जलन से संक्रमण और वेंटिलेटर पर निर्भरता को मौत का मुख्य कारण बताया गया है। पुलिस ने परिजनों के बयान दर्ज किए हैं, लेकिन अभी तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। भोपा की भूमिका की भी जांच चल रही है, क्योंकि ऐसी घटनाओं में तांत्रिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के प्रावधान हैं। जिला प्रशासन ने परिवार को शव सौंप दिया है, और अंतिम संस्कार इरांश गांव में ही कर दिया गया।

विशेषज्ञों की चेतावनी: ग्रामीण भारत में अंधविश्वास का काला साया यह घटना अकेली नहीं है। राजस्थान और पड़ोसी राज्यों में निमोनिया या सांस की बीमारियों के नाम पर गर्म सलाखों से दागने की कुप्रथा कई मासूमों की जान ले चुकी है। डॉक्टरों का कहना है कि निमोनिया एक बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण है, जिसका इलाज एंटीबायोटिक्स और सही देखभाल से संभव है। लेकिन गर्म धातु से दागने से त्वचा फट जाती है, संक्रमण फैलता है और सांस की नलियां प्रभावित हो जाती हैं। महात्मा गांधी अस्पताल के पीडियाट्रिशियन डॉक्टर ने  कहा, "ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच न होने से लोग झाड़-फूंक पर भरोसा करते हैं। हमारी अपील है कि बच्चों की बीमारी पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। अंधविश्वास जानलेवा साबित हो सकता है।"जिला कलेक्टर ने भी इस घटना पर संज्ञान लेते हुए निर्देश दिए हैं कि गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाया जाए। एनजीओ और स्वास्थ्य विभाग मिलकर 'नो टू सुपरस्टिशन' कैंपेन चला रहे हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं बताती हैं कि सफर अभी लंबा है।

परिवार का दर्द: पछतावे की आग में जल रही मां   मां का रो-रोकर बुरा हाल है। उन्होंने कहा, "मैंने तो बच्चे को बचाने के लिए ऐसा किया था, लेकिन अब वो हमसे हमेशा के लिए चला गया। काश, हम डॉक्टर के पास पहले चले जाते।" देव बागरिया ने अपील की कि कोई अन्य परिवार ऐसी गलती न करे। परिवार गरीब किसान है, और इस दुख ने उन्हें तोड़ दिया है।

 

Mohit Parihar

Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor

Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.

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