सरकारी स्कूलों में 'नो एंट्री' और वीडियोग्राफी बैन का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, क्या अपनी नाकामी छिपा रही हैं यूपी-राजस्थान सरकारें?

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर लगे बैन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर। जानिए याचिकाकर्ता ने क्या उठाए गंभीर सवाल।

yashaswani
yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026Sub Editor
August 23, 2026 • 2:28 PM  5
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राजस्थान
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सरकारी स्कूलों में 'नो एंट्री' और वीडियोग्राफी बैन का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, क्या अपनी नाकामी छिपा रही हैं यूपी-राजस्थान सरकारें?
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सरकारी स्कूलों में 'नो एंट्री' और वीडियोग्राफी बैन का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, क्या अपनी नाकामी छिपा रही हैं यूपी-राजस्थान सरकारें?

उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राज्य सरकारों द्वारा सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर लगाई गई रोक का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इस तुगलकी फरमान के खिलाफ अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसमें इन विवादित सर्कुलर को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग की गई है।

क्या है सरकारों का विवादित आदेश?

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, दोनों राज्यों के शिक्षा विभागों द्वारा जारी किए गए सर्कुलर में स्कूल परिसर को बाहरी लोगों के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस आदेश के तहत बिना पूर्व अनुमति के कोई भी पत्रकार, यूट्यूबर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर या नागरिक समाज का प्रतिनिधि स्कूल में प्रवेश नहीं कर सकता। इसके अलावा, स्कूल के अंदर किसी भी तरह की फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, ऑडियो रिकॉर्डिंग, लाइव-स्ट्रीमिंग या शिक्षकों/छात्रों का इंटरव्यू लेने पर भी सख्त पाबंदी लगा दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की मुख्य दलीलें:

 याचिकाकर्ता ने इस प्रतिबंध को लोकतंत्र, पारदर्शिता और मौलिक अधिकारों पर सीधा प्रहार बताया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL में निम्नलिखित अहम बिंदु उठाए गए हैं:

  • संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन: याचिका में तर्क दिया गया है कि यह सरकारी आदेश सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी), 19(1)(g) (व्यापार या पेशे की स्वतंत्रता), 21 (जीवन जीने का अधिकार) और 21-A (शिक्षा का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

  • प्रेस और मीडिया की आजादी पर हमला: अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला देते हुए कहा गया है कि मीडिया को सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत कवर करने से रोकना आम जनता के 'सूचना के अधिकार' (Right to Information) को दबाने की कोशिश है।

  • भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही को मिलेगा बढ़ावा: सरकारी व्यवस्थाओं पर निगरानी रखना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है। स्कूलों में 'नो-एंट्री' का बोर्ड लगाने से सिस्टम की पारदर्शिता खत्म होगी, जिससे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण मिलेगा।

  • अव्यवस्था और शिक्षकों की कमी छिपाने की साजिश: याचिका में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि सरकारें स्कूलों में चरमराती बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की भारी कमी की सच्चाई को दुनिया से छिपाने के लिए इस सर्कुलर का इस्तेमाल कर रही हैं। यह रवैया बच्चों के 'राइट टू एजुकेशन' (RTE) पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

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yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026Sub Editor

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