शुक्रवार को भोईवाड़ा में इस आयोजन की धूम रही, जहां एक युवक को 'भूत' का रूप देकर रस्सियों से मजबूती से बांधा गया और उसे पूरे मोहल्ले की तंग गलियों में घुमाया गया। यह परंपरा पिछले 50 साल से अधिक समय से निर्भरतापूर्वक निभाई जा रही है। स्थानीय लोग इसे 'भोलेनाथ की चेली' (भगवान शिव की चेली) के रूप में पूजते हैं।
परंपरा का उद्देश्य और मान्यता
इस झांकी के पीछे की भावना बेहद सकारात्मक और नेक है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, नए साल की शुरुआत (चैत्र नवरात्रि के साथ गणगौर उत्सव) में भूत को बांधकर मोहल्ले में घुमाने से इलाके की सारी नकारात्मक ऊर्जा, बीमारियां, बुरी नजर और अशुभ शक्तियां दूर हो जाती हैं। यह एक प्रतीकात्मक रस्म है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है।
भूत का रूप धारण करने वाला युवक समाज का ही सदस्य होता है। उसे डरावने वेशभूषा में सजाया जाता है – सफेद या काला चेहरा, उलझे बाल, और विशेष पोशाक। रस्सियों से बांधकर उसे नियंत्रित रखा जाता है, ताकि वह स्वतंत्र रूप से नहीं घूम सके, बल्कि जुलूस के साथ चले। ढोल-नगाड़ों की जोरदार थाप, लोक गीतों और भीड़ की हुंकार के बीच यह झांकी निकलती है, जिससे पूरा इलाका एक अलग ही ऊर्जा से भर जाता है।
लोगों का प्यार और आतिथ्य
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जहां कहीं भी यह 'भूत' जाता है, वहां लोग उसे डरते नहीं, बल्कि बड़े प्यार और सम्मान से स्वागत करते हैं। हर घर के दरवाजे पर पहुंचकर वह युवक भूत रूप में खड़ा होता है, और लोग उसे खिलाते-पिलाते हैं। भांग की पकौड़ियां, भुजिया, मीठे पदार्थ और अन्य प्रसाद बांटे जाते हैं। कोई उसे भगाता नहीं, बल्कि यह मानते हैं कि इससे घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
भोईवाड़ा के निवासी रवि माली ने बताया, "दातन हेला का दृश्य अपने आप में बहुत रोमांचक और जीवंत होता है। बचपन से मैं इसे देखता आ रहा हूं। मेरे परिवार के बुजुर्ग इसे करते थे, अब हम इसे आगे बढ़ा रहे हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच जब झांकी निकलती है, तो मोहल्ले में अलग ही जोश भर जाता है।"यह परंपरा केवल स्थानीय नहीं रह गई है। आसपास के गांवों से भी लोग इसे देखने पहुंचते हैं, और यह उदयपुर की सांस्कृतिक विविधता का एक जीवंत उदाहरण बन गई है।
गणगौर उत्सव का मुख्य आकर्षण: शाही सवारी
दातन हेला के बाद गणगौर उत्सव का असली रंग अब शुरू हो रहा है। स्थानीय निवासी नीरज माली के अनुसार, शनिवार शाम 4 बजे से भव्य शाही सवारी का आगाज होगा, जो अगले चार दिनों तक शहर में पूरी शान-शौकत के साथ घूमेगी।इस दौरान उदयपुर की महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी घाघरा-चोली, ओढ़नी और आभूषणों में सज-धजकर निकलेंगी। वे सिर पर गणगौर माता (ईसर-गौर यानी शिव-पार्वती) की प्रतिमा रखकर गणगौर घाट पहुंचेंगी। पिछोला झील के किनारे लोक गीतों, घूमर नृत्य और विशेष पूजा-अर्चना होगी। यह सवारी मेवाड़ की शाही विरासत को दर्शाती है और पर्यटकों के लिए भी प्रमुख आकर्षण रहती है।
मेवाड़ की जीवंत संस्कृति
भोईवाड़ा की यह अनोखी परंपरा हर साल लोगों का ध्यान खींचती है। यह दिखाती है कि कैसे प्राचीन मान्यताएं आज भी जीवित हैं और युवा पीढ़ी उन्हें उत्साह से निभा रही है। गणगौर उत्सव न केवल महिलाओं के सौभाग्य और वैवाहिक सुख का प्रतीक है, बल्कि पूरे मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखने का माध्यम भी है।