“जब बेटी बनी ‘बेटा’: बृजेश कंवर ने पिता को दी मुखाग्नि, टूटीं सदियों पुरानी परंपराएं”

एक ऐसी भावुक कहानी सामने आई है, जिसने समाज की पुरानी परंपराओं को चुनौती दे दी। पिता की अंतिम विदाई के दौरान एक बेटी ने ऐसा कदम उठाया कि वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि रिश्तों की ताकत और बदलती सोच की एक गहरी मिसाल बन गया।

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TEAM KHATAK Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Editor
April 16, 2026 • 4:46 PM  12
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“जब बेटी बनी ‘बेटा’: बृजेश कंवर ने पिता को दी मुखाग्नि, टूटीं सदियों पुरानी परंपराएं”
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16 Apr 2026
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“जब बेटी बनी ‘बेटा’: बृजेश कंवर ने पिता को दी मुखाग्नि, टूटीं सदियों पुरानी परंपराएं”

सवाई माधोपुर से एक ऐसी भावुक और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने न सिर्फ लोगों की आंखें नम कर दीं, बल्कि समाज की पुरानी सोच को भी गहराई से झकझोर दिया। यह कहानी एक बेटी की है—जिसने अपने पिता को अंतिम विदाई देकर यह साबित कर दिया कि रिश्तों की ताकत लिंग नहीं, बल्कि प्रेम और संस्कार होते हैं।

अंतिम सफर में बदल गई परंपरा

बाल मंदिर कॉलोनी में उस दिन माहौल बेहद गमगीन था। ठाकुर मोहन सिंह राजावत के निधन के बाद जब उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो हर किसी की नजरें एक पल के लिए ठहर गईं। क्योंकि कंधा देने के लिए आगे बढ़ी थीं उनकी बेटी—बृजेश कंवर। समाज की नजर में भले ही वह “बेटी” थीं, लेकिन उनके पिता के लिए वह हमेशा “बेटा” रही थीं।

पिता का सपना और बेटी का वादा

मोहन सिंह राजावत लंबे समय से ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे। इस कठिन समय में उन्होंने अक्सर कहा था “मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं है… और मेरी अंतिम विदाई भी वही करेगी।” आज वही शब्द हकीकत बन गए। बृजेश कंवर ने अपने आंसुओं को भीतर समेटकर, खुद को मजबूत किया और अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूरा किया।

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