नंगे पैर चलना, हाथ में लाठी और दूसरी ओर पानी से भरी बाल्टी लेकर पौधों को सींचना उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या बन चुकी है।
150 से ज्यादा पौधों की बन गईं मां
लुहारिया गांव के सरकारी स्कूल परिसर में विकसित ‘स्मृति वन’ में आम, जामुन, पीपल, वट, बिल्वपत्र, आंवला सहित 150 से अधिक पौधे लगाए गए हैं। इन पौधों को विद्यालय के शिक्षकों और ग्रामीणों ने मिलकर लगाया था, लेकिन उनकी नियमित देखभाल की जिम्मेदारी कन्नी बाई ने अपने ऊपर ले ली।
आज ये पौधे धीरे-धीरे विशाल वृक्षों का रूप ले रहे हैं और पूरे परिसर को हरियाली से भर रहे हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि कन्नी बाई हर पौधे को अपने बच्चे की तरह मानती हैं। यदि कोई पौधा सूख जाता है तो वे उसी दिन नया पौधा लगाकर उसकी जगह भर देती हैं। इतना ही नहीं, पौधों की सुरक्षा के लिए लगाए गए ट्री-गार्ड की मरम्मत भी खुद करती हैं।
कम उम्र में पति का निधन, फिर भी नहीं हारीं हिम्मत
कन्नी बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। कम उम्र में ही उनके पति स्वर्गीय नारायण सिंह मीणा का निधन हो गया था। उस समय परिवार की सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी तीन बेटियों तथा एक बेटे का पालन-पोषण अकेले किया। आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने परिवार को संभाला और बच्चों को बेहतर भविष्य दिया।
आज भी जीवन के इस पड़ाव पर उनका जज़्बा युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
स्कूल में पानी नहीं था, तो अपने कुएं से पहुंचा दिया पानी
कन्नी बाई की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने केवल पौधे लगाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके संरक्षण के लिए भी अनोखा रास्ता निकाला।
स्कूल परिसर में पानी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में अधिकांश पौधों के सूखने का खतरा था। लेकिन कन्नी बाई ने हार नहीं मानी।
चूंकि उनका खेत स्कूल की दीवार से सटा हुआ है, इसलिए उन्होंने अपने निजी नलकूप (ट्यूबवेल) से पाइपलाइन जोड़कर स्कूल तक पानी पहुंचाया। आज इसी पानी से पूरा स्मृति वन सिंचित हो रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि कन्नी बाई यह पहल नहीं करतीं तो शायद आज यह उपवन अस्तित्व में नहीं होता।
खुद अनपढ़ लेकिन बेटे को बनाया फौजी अफसर
कन्नी बाई भले ही कभी स्कूल नहीं जा सकीं, लेकिन उन्होंने शिक्षा और देशसेवा का महत्व भली-भांति समझा।
उनके इकलौते पुत्र रामेश्वर मीणा भारतीय सेना में सूबेदार के पद तक पहुंचे और हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं।
गांव के लोग बताते हैं कि बेटे की फौजी नौकरी के कारण कन्नी बाई हवाई जहाज में भी सफर कर चुकी हैं, लेकिन उनकी सादगी और अपनी मिट्टी से जुड़ाव आज भी वैसा ही बना हुआ है।
धीरे-धीरे विकसित हो रहा है ‘स्मृति वन’
विद्यालय के प्रधानाध्यापक हेमेंद्र जानी, पर्यावरण प्रभारी वार्षिका सारंगदेवोत और शिक्षक अनिल मीणा के प्रयासों से इस उपवन का विकास किया गया।
शिक्षकों और ग्रामीणों ने मिलकर यहां कई छायादार और फलदार पौधे लगाए हैं। कन्नी बाई की नियमित देखरेख की वजह से अब यहां विभिन्न प्रकार के फूल भी खिलने लगे हैं, जिससे स्कूल परिसर की सुंदरता और बढ़ गई है।
अधिकारी ने भी की सराहना
बड़ी सादड़ी के एसीबीईओ जगदीश चन्द्र धाकड़ ने कहा कि लुहारिया विद्यालय वास्तविक पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण बन गया है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में विद्यालय में चौकीदार या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का पद नहीं है और 7 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 3 शिक्षक कार्यरत हैं। आगामी शैक्षणिक सत्र में शिक्षकों की व्यवस्था को बेहतर बनाया जाएगा।
पर्यावरण दिवस पर बड़ा संदेश
आज जब पर्यावरण संरक्षण केवल अभियानों और नारों तक सीमित होता जा रहा है, तब कन्नी बाई जैसी महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो एक व्यक्ति भी बड़ा बदलाव ला सकता है।
85 वर्ष की उम्र में उनका यह समर्पण न केवल पर्यावरण प्रेम का उदाहरण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणादायक संदेश भी है कि प्रकृति की सेवा ही भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है।